शालिग्राम शिला महज पत्थर नहीं बल्कि भगवान विष्णु हैं, आज भी भुगत रहे हैं इन देवी का श्राप

आपने कई पौराणिक कथाएं सुनी होंगी जिसमें कई देवता को श्राप मिला हुआ है। अपने श्राप के कारण देवताओं से लेकर भगवान ने भी बुरा समय देखा है। 


"भगवान विष्णु ने छल से इस देवी का पतिव्रत तोड़ दिया था"


आपने कई पौराणिक कथाएं सुनी होंगी जिसमें कई देवता को श्राप मिला हुआ है। अपने श्राप के कारण देवताओं से लेकर भगवान ने भी बुरा समय देखा है। आज हम आपको ऐसे ही एक श्राप के बारे में बता रहे हैं जिसकी वजह से भगवान विष्णु को पत्थर बनकर रहना पड़ रहा है।


ये जगह है भारत के पड़ोसी देश नेपाल की। जहां श्राप के कारण आज भी विष्णु भगवान पत्थर बने हुए हैं। हम बात कर रहे हैं नेपाल के गंडकी नदी की। अगर शिवपुराण की माने तो "दैत्यों के राजा शंखचूड़ की पत्नी का नाम  तुलसी  था। तुलसी बहुत ज्यादा पतिव्रता थी। उनकी पतिव्रत के कारण देवता लोग भी उन्हें हरा नहीं पाते थे। ऐसे में भगवान विष्णु ने छल से तुलसी का पतिव्रत भंग कर दिया था। जिसके बाद शंखचूड़ की मृत्यु हो गई थी। अब जब ये बात तुलसी को पता चली थी तो उन्होंने भगवान विष्णु को पत्थर बनने का श्राप दिया था। इस श्राप पर भगवान विष्णु ने तुलसी को गंडकी नदी और तुलसी के पौधे होने की बात कही थी। "बता दें कि यहां गंडकी नदी में एक अलग ही प्रकार के काले पत्थर मिलते हैं।


इन पत्थरों पर चक्र, गदा आदि के निशान बने हुए हैं। ग्रंथों के अनुसार ये पत्थर भगवान विष्णु का स्वरूप है। इन पत्थरों को शालिग्राम शिला भी कहते हैं। शिवपुराण की माने तो "भगवान विष्णु ने खुद ही गंडकी नदी में आकर वास किया। साथ में ये भी कहा कि नदी में रहने वाले करोड़ों कीड़े अपने तीखे दांतों से काट-काटकर उस पाषाण में मेरे चक्र का चिह्न बनाएंगे। जिसको मेरा रूप मान कर उसकी पूजा होगी। ग्रंथों की माने तो ऐसा बताते हैं कि एक समय पर भगवान विष्णु से तुलसी ने उन्हें अपने पति के रूप में पाने के लिए कई सालों तक तपस्या की थीं। जिसके बाद उन्होंने तुलसी को वरदान भी दिया था। विष्णु का ये वरदान देवप्रबोधिनी एकादशी पर पूरा होता है यानि इस देवप्रबोधिनी एकादशी पर शालिग्राम शिला और तुलसी के पौधे का विवाह होता है।

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